नई दिल्ली27मई25*भारत का नया हवाई योद्धा:
SU-57 की एंट्री से अमेरिका में हलचल
F-35 की जगह SU-57: भारत का साहसिक फैसला। अमेरिका को झटका: भारत ने SU-57 को चुना,
F-35 को कहा ना.. ना.. ना….
अब दुनिया को समझ आ गया कि भारत अब कोई भी फैसला आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान के आधार पर लेता है, दबाव में नहीं।
भारत और रूस के बीच हुए इस अहम डील ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर SU-57 अब भारतीय वायुसेना की ताकत बनने वाला है।
और इसकी संख्या होगी पूरे 24….
यह वही फाइटर जेट है जिसे रूस ने सबसे ज्यादा गोपनीय रखा और अब भारत उसका पहला बड़ा इंटरनेशनल ऑपरेटर बनने जा रहा है।
अमेरिका को यह बात इतनी चुभी कि उसने फौरन लॉकहीड मार्टिन के CEO को भारत भेजने का फैसला किया, जो F-35 फाइटर जेट पर बातचीत करने वाले थे
लेकिन भारत ने यह कहकर उनकी यात्रा टाल दी कि इस समय हमारे पास समय नहीं है। यह सीधा संकेत था कि अब भारत को अपनी ज़रूरत खुद पता है और वो किसी विदेशी दबाव में आकर कोई सौदा नहीं करेगा।
SU-57 की ताकत की बात करें तो ये लड़ाकू विमान सिर्फ रडार से बचने में माहिर नहीं है, बल्कि इसमें आधुनिक एआई आधारित सिस्टम, सुपरक्रूज़ की क्षमता, हाई मैनुवरबिलिटी और मल्टीटारगेट अटैक जैसी खूबियाँ हैं।
ये जेट दुश्मन की आंखों में धूल झोंकने और एकसाथ कई मोर्चों पर हमला करने के लिए तैयार रहता है।
ये फैसला सिर्फ एक फाइटर जेट की खरीदारी का नहीं, बल्कि रणनीतिक संकेत भी है। भारत ने अमेरिका को बता दिया है कि अब वो अपनी रक्षा नीतियों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
भारत को ये भी समझ आ गया है कि अमेरिका जब चाहे F-16 पाकिस्तान को दे सकता है, तो हमें भी अपने हितों को देखते हुए फैसले लेने का पूरा अधिकार है।
F-35 की तुलना में SU-57 कम खर्चीला, ज्यादा बहुआयामी और भारत के ऑपरेशनल माहौल के ज़्यादा अनुकूल है
रूस पहले ही भारत के S-400 डील में भरोसेमंद साबित हो चुका है। अब SU-57 के आने से भारत की एयर डॉमिनेंस क्षमता एशिया में शीर्ष पर पहुंचने वाली है।
मोदी सरकार का यह फैसला सिर्फ डिफेंस डील नहीं, भारत की विदेश नीति की दृढ़ता और स्वाभिमान का प्रतीक है।
आज भारत की पहचान एक ऐसे देश के रूप में हो रही है जो ना सिर्फ युद्ध के मैदान में बल्कि कूटनीति के अखाड़े में भी अपनी शर्तों पर खेलता है।
तो जब भारत ने SU-57 का हाथ थामा और F-35 को ठुकराया, तो ये सिर्फ तकनीक का नहीं, आत्मगौरव का भी चयन था।
अब दुनिया जान चुकी है—
भारत किसी का मोहताज नहीं, अब भारत नेतृत्व करता है। कोई भी डील अपनी शर्तों पर करता है। अमेरिका अगर टेक्नोलॉजी शेयर नहीं करेगा तो हम उसके फाइटर प्लेन आधे पौने दाम पर नहीं खरीदेंगे।
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