जबलपुर १७फरवरी २६ * दिल छू लेने वाली है अथर्व की कहानी चीफ जस्टिस ने कहां… ‘तुम्हें वकील बनना चाहिए’
जबलपुर की एक शांत कॉलोनी में रहने वाला एक साधारण-सा लड़का… जिसे शाम को टीवी पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखना पसंद है, जो क्रिकेट में बाएं हाथ से बल्ला थामता है और जो बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग और मेडिकल दोनों में चयन पा सकता था उसने डॉक्टर बनने का सपना चुना, उसका नाम है अर्थव चतुर्वेदी. पर सपनों की राह हमेशा सीधी नहीं होती.
अर्थव ने नीट परीक्षा दो बार उत्तीर्ण की, 530 अंक लाए. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ईडब्ल्यूएस के तहत उसका स्थान बनता था लेकिन जब निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश का समय आया तो पता चला कि राज्य सरकार ने निजी संस्थानों में ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू करने की स्पष्ट नीति ही नहीं बनाई है. अंक थे, योग्यता थी, पर दरवाजा बंद था. जिस लड़के ने किताबों में मानव शरीर के रहस्य पढ़े थे. उसे अब संविधान के अनुच्छेद पढ़ने पड़े
19 साल के लड़के ने इतिहास रच दिया. बिना वकालत किए उन्होंने कोर्ट में ऐसी बहस की कि चीफ जस्टिस को बोलना पड़ा, ‘तुम वकील बन जाओ’, तब छात्र ने कहा, ‘नहीं मैं डॉक्टर ही बनूंगा’. ये मामाला जबलपुर के होनहार अथर्व चतुर्वेदी का है. अथर्व इन दिनों खूब चर्चा में हैं. अथर्व ने EWS कोटे के तहत निजी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए अपना केस खुद लड़ा. जबलपुर हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक गए और केस जीतकर एडमिशन लिया. अथर्व की कानून के प्रति समझ और बहस की शैली से प्रभावित होकर सुप्रीम कोर्ट की बेंच को उनका केस सुनना ही पड़ा.
दरअसल, डॉक्टर बनने का सपना लेकर निकले जबलपुर के अथर्व चतुर्वेदी को पहले वकील बनकर अपना केस लड़ना पड़ा. कोर्टरूम में खुद अपनी पैरवी की. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142 की विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अथर्व को MBBS में एडमिशन देने का आदेश जारी किया. यह मामला EWS कोटे के तहत निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश से जुड़ा था. इसके लिए मध्य प्रदेश के जबलपुर में रहने वाले महज 19 साल के अथर्व चतुर्वेदी ने 1 साल तक पिता की मदद से अकेले ही कानूनी लड़ाई लड़ी. लोकल 18 पर अथर्व ने अपनी संघर्ष की कहानी खुद बयां की…
चीफ जस्टिस ने कहां… ‘तुम्हें वकील बनना चाहिए’
दरअसल, अथर्व ने 2024 और 2025 में दो बार NEET परीक्षा क्वालीफाई की. पहली बार उन्हें 530 अंक मिले, लेकिन EWS कोटे के तहत निजी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने न्याय की लड़ाई शुरू की. साल 2024 और 10 जुलाई 2025 को स्वयं अपनी बात रखने हाईकोर्ट पहुंचे. अथर्व ने बताया, इसके लिए उन्होंने खुद तैयारी की थी. केस से जुड़े कोर्ट के दूसरे फैसले देखे थे. बताया, जबलपुर हाईकोर्ट में उनकी दलीलें सुनकर तत्कालीन चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत ने मुस्कुराते हुए कहा था “तुम्हें वकील बनना चाहिए”. लेकिन, हाईकोर्ट में बात नहीं बनी, तब अथर्व सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. 2024 में जस्टिस गवई की बेंच ने उन्हें हाईकोर्ट में रिव्यू फाइल करने को कहा. लेकिन, 2025 में हाईकोर्ट ने रिव्यू भी खारिज कर दिया
जजों की बेंच ने जाते-जाते सुना दिया फैसला…
इसके बाद अथर्व ने दोबारा SLP दायर की, जिसे भी खारिज कर दिया गया. लेकिन, हिम्मत नहीं हारी. 24 नवंबर 2025 को तीसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और घर से वीडियो कॉल से जुड़े. इस बार उनकी करीब 4 मिनट की दलील ने कोर्ट को चौंका दिया. बेंच उठने ही वाली थी कि अथर्व ने खुद अपनी बात रखने की गुजारिश की. सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए MBBS में प्रवेश का आदेश दिया. अथर्व की यह कहानी बताती है कि सपने अगर सच्चे हों तो उम्र मायने नहीं रखती. लिहाजा जजों ने भी उनके तर्कों को सराहा और एक छात्र का डॉक्टर बनने का सपना साकार हो गया.

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