एसकेएम पैम्फलेट –
हरियाणा 7दिसम्बर 25*बीज विधेयक 2025 – संघीय अधिकारों का गला घोंटने तथा खाद्य सुरक्षा, बीज संप्रभुता को नष्ट करने वाला एक और कानून*
*एसकेएम 8 दिसंबर 2025 को पूरे भारत के गाँवों में बीज विधेयक 2025 के मसौदे की प्रतियाँ जलाने का आह्वान करता है*
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (MoAFW) द्वारा 12 नवंबर 2025 को बीज विधेयक 2025 का मसौदा जारी किया गया, जिसके लिए सार्वजनिक टिप्पणियों की अंतिम तिथि 11 दिसंबर 2025 निर्धारित है। यह विधेयक पुराने बीज अधिनियम, 1966 को बदलकर गुणवत्ता नियंत्रण और केवल प्रमुख अपराधों पर कड़ी दंड व्यवस्था लागू करने हेतु बनाया गया है। एसकेएम इस प्रतिगामी विधेयक की कड़ी निंदा करता है, जो भारतीय बीज क्षेत्र पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) और कॉर्पोरेट का वर्चस्व स्थापित करेगा, खाद्य सुरक्षा व बीज संप्रभुता को गंभीर रूप से कमजोर करेगा और राज्यों के संघीय अधिकारों को कुचल देगा। अतः एसकेएम इसकी तत्काल वापसी की मांग करता है।
यह बीज विधेयक एमएनसी और कॉर्पोरेट को बीज आपूर्ति पर नियंत्रण प्रदान करेगा, और वही लक्ष्य पूरा करेगा जो अनुबंध खेती कानून लेकर आया था। इससे फसल चक्र कॉर्पोरेट बाज़ार के हितों के अनुसार बदल जाएंगे। इसमें सस्ते और गुणवत्तापूर्ण बीजों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने, खाद्य सुरक्षा, किसान की आर्थिक सुरक्षा और लाभकारी कृषि की कोई गारंटी नहीं है। किसी भी सरकार के बीज विधेयक का यह मुख्य लक्ष्य होना चाहिए, परंतु मोदी सरकार ने इसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया है तथा यह विधेयक भारत में जीविका-आधारित कृषि के लिए विनाशकारी है।
मसौदा विधेयक एक अत्यधिक केंद्रीकृत और कॉर्पोरेट-प्रधान विनियामक व्यवस्था प्रस्तुत करता है जो किसान-केंद्रित सुरक्षा उपायों को और भारत की जैव विविधता संरक्षण तथा किसानों के अधिकारों की कानूनी संरचना को कमज़ोर कर सकती है। यह बाज़ार नियंत्रण और बीज प्रणालियों के कठोर औपचारिककरण को बढ़ावा देता है, जिससे स्वदेशी किस्मों, सार्वजनिक संस्थानों और पारंपरिक/अनौपचारिक बीज नेटवर्क का हाशियाकरण हो सकता है।
मसौदा विधेयक की धारा 17(8) “योग्यता-आधारित और पारदर्शी केंद्रीय मान्यता प्रणाली” बनाती है। एक बार किसी कंपनी को मान्यता मिल जाने पर वह स्वतः सभी राज्यों में पंजीकृत मानी जाएगी, और राज्य सरकारें केवल गलत जानकारी देने के मामलों में ही किसी कंपनी को अस्वीकार या प्रतिबंधित कर सकेंगी। यह बहु-राज्य निजी कंपनियों को अनुचित लाभ देता है, जबकि सार्वजनिक संस्थानों को ऐसा कोई विशेषाधिकार नहीं मिलता। यह राज्यों के अधिकारों को कमज़ोर करता है और संघीय ढांचे के खिलाफ है।
अनपंजीकृत किस्मों के आयात को परीक्षण हेतु अनुमति देना (धारा 33(2)) और विदेशी VCU (मूल्यांकन एवं उपयोगिता) परीक्षण केंद्रों को मान्यता देना (धारा 16(3)) विदेशी बीज कंपनियों के लिए नियमों को कमजोर कर देता है। इनके माध्यम से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने नए बीजों का भारत के बाहर ही स्वयं मूल्यांकन कर सकते हैं और फिर उन्हें भारत में पेश कर सकते हैं, जिससे भारतीय बहु-स्थान VCU परीक्षण प्रणाली को दरकिनार किया जा सकता है। इसके अलावा, यह राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की निगरानी से बाहर संसाधनों के आवागमन के लिए कानूनी रास्ता खोलता है। आयातित बीजों के भारतीय पर्यवेक्षण में परीक्षण की कोई प्रावधान नहीं है, जो संवेदनशील बीज क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के हाथ सौंपने में सरकार की अधीनता दर्शाता है।
इस कारण विदेशी कंपनियाँ भारतीय सार्वजनिक प्रजनन संस्थानों की तुलना में जल्दी और कम लागत में नई किस्में बाजार में ला सकेंगी, जबकि भारतीय संस्थानों को स्थानीय VCU प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ेगा। अनिवार्य ट्रेसबिलिटी, QR कोड और विस्तृत लेबलिंग (धारा 6, 21) जैसे नए मानकों को केवल बड़ी डिजिटल संरचना वाली कंपनियाँ ही पूरा कर पाएंगी। यह किसान समूहों के लिए असमान और हानिकारक स्थिति उत्पन्न करेगा तथा अंततः बीज संप्रभुता को कमजोर करेगा। एसकेएम ने आरोप लगाया कि बीजेपी–आरएसएस इस मसौदा विधेयक के माध्यम से किसानों व जनता के हितों के साथ विश्वासघात कर रही है।
बीज मूल्य विनियमन से जुड़े प्रावधान भी निजी बीज कंपनियों को लाभ देने वाले हैं, जो शोषणकारी मूल्य निर्धारण करती हैं। धारा 22 कहती है कि केंद्र सरकार केवल “आपात परिस्थितियों” में ही मूल्य नियंत्रित कर सकती है। आपात स्थिति को “बीजों की कमी, कीमतों में असामान्य वृद्धि, एकाधिकार मूल्य निर्धारण या मुनाफाखोरी” जैसे अस्पष्ट शब्दों में परिभाषित किया गया है। दूसरी ओर, मामूली अपराध वह है जिसमें बीज की बिक्री “केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य से अधिक” पर की जाती है। इन प्रावधानों में स्पष्टता का अभाव है: बीज कमी का मतलब क्या है? क्या कीमत असामान्य मानी जाएगी? केंद्र सरकार क्या मूल्य निर्धारित करती है? यह अस्पष्टता निजी कंपनियों को शोषणकारी मूल्य जारी रखने और कृषि संकट बढ़ाने की छूट देती है।
बीज विधेयक 2025 हर “प्रकार या किस्म” के बीज के अनिवार्य पंजीकरण को अनिवार्य करता है, जिसमें ग्राफ्ट, कटिंग, ट्यूबर, बल्ब, टिश्यू-कल्चर प्लांट और दूसरे नर्सरी स्टॉक जैसे वेजिटेटिव तरीके से उगाए जाने वाले प्लांटिंग मटीरियल शामिल हैं। लेकिन भारत के सार्वजनिक उद्यानिकी क्षेत्र में इन फसलों के प्रमाणीकरण, रेफरेंस लैब, तथा फील्ड परीक्षण हेतु पर्याप्त अवसंरचना मौजूद नहीं है। इसके विपरीत, निजी नर्सरी और कॉर्पोरेट उद्यानिकी कंपनियों के पास पूंजी, डायग्नोस्टिक उपकरण और तेज़ आपूर्ति श्रृंखलाएँ हैं, जिनसे वे इन नियमों का जल्दी पालन कर बाज़ार पर कब्ज़ा कर सकती हैं।
साथ ही, भारी मात्रा में विदेशी उद्यानिकी पौध सामग्री निजी चैनलों के माध्यम से अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर रही है, जिससे जैव सुरक्षा जोखिम बढ़ते हैं। केवल नर्सरी पंजीकरण को इन अनियमित परिचयों को वैध करने का रास्ता नहीं बनना चाहिए। बिना सार्वजनिक परीक्षण सुविधाओं और क्वारंटीन व्यवस्था को मजबूत किए, यह विधेयक सार्वजनिक उद्यानिकी संस्थानों को और कमजोर करेगा।
भारत वर्तमान में CBD (जैव विविधता अभिसमय) और ITPGRFA (पादप आनुवंशिक संसाधन संधि) के अंतर्गत महत्वपूर्ण वार्ताओं में शामिल है ताकि अपनी विविध आनुवंशिक संपदा के वैश्विक उपयोग से उचित लाभ-साझेदारी सुनिश्चित कर सके। विश्व के सर्वाधिक जैव विविधता वाले देशों में से एक होने के कारण, भारत को अपने किसानों और स्थानीय समुदायों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए मजबूत संप्रभु अधिकार ढांचे की आवश्यकता है। ऐसे समय में कोई भी कानून जो इन अधिकारों को कमजोर करे या कंपनियों को अनियंत्रित पहुंच दे, भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को कमजोर करेगा। सार्वजनिक संस्थानों की मजबूत भूमिका, पारदर्शी विनियमन और सुव्यवस्थित निजी साझेदारी ही सुनिश्चित कर सकती है कि भारत और उसके किसान अपने आनुवंशिक संसाधनों से उचित लाभ प्राप्त करें। किंतु मसौदा बीज विधेयक 2025 इन सार्वजनिक हितों के बिल्कुल विपरीत है।
एसकेएम पूरे देश के किसानों से इस प्रतिगामी विधायी सुधार के खिलाफ संगठित होने का आह्वान करता है, जो बीज क्षेत्र का निजीकरण, भारतीय जैव विविधता पर एमएनसी लाभार्जन और खाद्य सुरक्षा व बीज संप्रभुता को नष्ट करेगा। यदि इसे लागू होने दिया गया, तो बेयर, बीएएसएफ, सिंगेंटा, एडवांटा इंडिया, कॉर्टेवा एग्रीसाइंस इंडिया, महायको जैसी कंपनियाँ भारतीय बीज क्षेत्र व कृषि उत्पादन पर नियंत्रण कर लेंगी और किसान-आधारित कृषि को नष्ट कर देंगी। एसकेएम किसानों से अपील करता है कि 8 दिसंबर 2025 को अपने गाँवों में बीज विधेयक की प्रतियाँ जलाकर संघीय अधिकारों और बीज संप्रभुता की रक्षा करें।
(समाप्त)
जारीकर्ता –
*मीडिया सेल | संयुक्त किसान मोर्चा*
संपर्क: 9447125209 | 9830052766
samyuktkisanmorcha@gmail.com

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