वाराणसी 5 मार्च 26*रामकृष्ण मिशन अस्पताल सिर्फ सेवा आश्रम नाम का ही रह गया, व्यवस्था दलाली पर*
वाराणसी से नीलिमा राय की खास खबर यूपीआजतक
वाराणसी* के लक्सा स्थित रामकृष्ण मिशन सेवा आश्रम सिर्फ नाम का हीं सेवा आश्रम रह गया, वहां कोई सेवा का भाव किसी भी कर्मचारी के अंदर आप नहीं देख सकते वहां सिर्फ लूटपाट के साथ लोगों में भेदभाव कर इलाज किया जा रहा है पीड़ित बताता है कि कैश काउंटर पर बैठे तीन बंदर जो देखने में एक यमराज जैसा मोटू दूसरा दाढ़ी रखकर खुद को महाराज का नया रूप तीसरा हमेशा खाने में व्यस्त सिर्फ लोगों को परेशान करते हैं और तो और बात करने की भी तमीज नहीं है महिला से भी अभद्र भाषा में अमर्यादित शब्दों का प्रयोग करते हैं ! मोटा सा तोंद लेकर एक व्यक्ति जो वहां बैठकर सिर्फ मरीज के सामने खाता रहता है उसको खुद इलाज की जरूरत है नहीं तो कोई परेशान पीड़ित यदि यह बाहर मिल गया तो उसका इलाज भरपूर कर देगा क्योंकि निहायत बदतमीज और बेहूदा किस्म का व्यक्ति है जो लगातार मरीजों के साथ दुर्व्यवहार करता है !
आज चिकित्सा विज्ञान जिस ऊँचाई पर है, वहाँ बीमारी की सही पहचान के लिए अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी जाँचें सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। लेकिन कुछ अस्पतालों में हकीकत इसके उलट है—न अल्ट्रासाउंड, न सीटी स्कैन… सिर्फ एक ही मंत्र: “ब्लड जांच करा लीजिए।”
*जितनी भी महंगी जांच होती है जैसे सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड सब निजी चिकित्सालय को भेजा जाता है*
मरीज दर्द से कराहता हुआ आता है। पेट में समस्या हो, सीने में दर्द हो, सिर चकरा रहा हो—हर बीमारी का पहला और अंतिम समाधान बना दिया गया है ब्लड टेस्ट। बिना यह समझे कि कई रोगों की पुष्टि के लिए इमेजिंग टेस्ट अनिवार्य होते हैं, सिर्फ खून की रिपोर्ट के आधार पर दवाइयाँ थमा दी जाती हैं।
*यह तरीका चिकित्सा की सावधानी नहीं, बल्कि लापरवाही की पराकाष्ठा है*…
*ब्लड टेस्ट शरीर की आंतरिक स्थिति का एक हिस्सा बताता है, लेकिन वह हर बीमारी का आईना नहीं होता*।
*सवाल यह है कि जब जरूरत हो, तब भी अल्ट्रासाउंड या सीटी स्कैन क्यों नहीं लिखा जाता*? और एक गंभीर सवाल इतने बड़े अस्पताल में यदि जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं तो फिर फर्जी तरीके से प्रचार प्रसार की क्या आवश्यकता ..?
कई बार कारण साफ है—या तो अस्पताल में सुविधा नहीं, या फिर मरीज को बाहर भेजने से “कमीशन तंत्र” प्रभावित होता है। नतीजा यह कि मरीज को अधूरी जांच के आधार पर इलाज मिलता है और बीमारी जड़ से खत्म नहीं होती।
*बीमारी बढ़ती है, मरीज फिर लौटता है—फिर ब्लड टेस्ट। यह सिलसिला चलता रहता है। इलाज कम, रिपोर्टों का कारोबार ज्यादा*
चिकित्सा पेशा सेवा का क्षेत्र है, लेकिन जब सेवा की जगह सुविधा और कमाई प्राथमिकता बन जाए, तो भरोसा टूटता है। एक जिम्मेदार डॉक्टर वही है जो लक्षणों को देखकर सही जांच की सलाह दे—चाहे वह ब्लड टेस्ट हो, अल्ट्रासाउंड हो या सीटी स्कैन !
*सिर्फ एक ही जांच के सहारे पूरे इलाज की इमारत खड़ी करना, मरीज के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है* !
सरकार और स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि ऐसे अस्पतालों की जांच हो जहाँ आवश्यक सुविधाएँ नहीं हैं, फिर भी बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं।
मरीजों को भी जागरूक होना होगा—डॉक्टर से पूछें कि कौन-सी जांच क्यों जरूरी है !!

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