मध्यप्रदेश18अप्रैल25* तात्या टोपे को फांसी की सज़ा कैसे मिली?
क्रांतिकारी तात्या टोपे को 18 अप्रैल, 1859 को मध्य प्रदेश के शिवपुरी में फांसी दी गई थी. वे 1857 के भारतीय विद्रोह के प्रमुख नेताओं में से एक थे.
तात्या टोपे को फांसी की सज़ा कैसे मिली?
7 अप्रैल, 1859 को शिवपुरी-गुना के जंगलों में सोते हुए धोखे से तात्या टोपे को पकड़ा गया था.
15 अप्रैल, 1859 को सैनिक अदालत ने राष्ट्रद्रोह के आरोप में तात्या टोपे को फांसी की सज़ा सुनाई.
18 अप्रैल, 1859 की शाम को ग्वालियर के पास शिप्री दुर्ग के निकट तात्या टोपे को फांसी दे दी गई.
हज़ारों लोगों की मौजूदगी में खुले मैदान में तात्या टोपे को फांसी दी गई.
कहते हैं कि तात्या टोपे ने दृढ़ कदमों से फांसी के चबूतरे पर चढ़कर फांसी के फंदे में अपना गला डाल दिया.
तात्या टोपे के बारे में कुछ और बातें:
उनका जन्म 16 फ़रवरी, 1814 को महाराष्ट्र के नासिक में हुआ था.
उनका मूल नाम रामचंद्र पांडुरंग राव था.
वे अपनी गुरिल्ला रणनीति के लिए कुख्यात थे.
उन्होंने मई 1857 में कानपुर में ईस्ट इंडिया कंपनी की भारतीय सेना को पराजित किया था.

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