February 10, 2026

UPAAJTAK

TEZ KHABAR, AAP KI KHABAR

नागपुर २ फ़रवरी २६**नशा मुक्त भारत अभियान पर सरकार का दोगलापन*

नागपुर २ फ़रवरी २६**नशा मुक्त भारत अभियान पर सरकार का दोगलापन*

नागपुर २ फ़रवरी २६**नशा मुक्त भारत अभियान पर सरकार का दोगलापन*

*नशे से मिलने वाला राजस्व अगर देश के भविष्य को खोखला करे, तो ऐसा लाभ किस काम का*

नागपुर के जागरूक नागरिक अनिल चौहान नें गंभीर विषय पर देश का भविष्य यूवा पीढ़ी कों जगाने और सरकार कों आईना दिखाते हुए बताया कि आज भारत एक ऐसे मौन संकट से गुजर रहा है, जो दिखाई तो देता है, पर उसे स्वीकार करने से हम कतराते हैं। शराब, गुटखा, तम्बाकू, गांजा जैसे नशीले पदार्थ देश की युवा पीढ़ी को मानसिक और शारीरिक रूप से खोखला कर रहे हैं। जो युवा राष्ट्र का भविष्य कहे जाते हैं, वही नशे की लत के कारण अपने वर्तमान और भविष्य—दोनों को अंधकार में धकेल रहे हैं।
सरकार नशे के विरुद्ध कानून बनाती है। जगह-जगह चेतावनियाँ लिखी होती हैं— “नशा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है”, “शराब पीना जानलेवा हो सकता है”। इसके बावजूद यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि नशा इतना ही घातक है, तो देशभर में शराब की फैक्ट्रियाँ, बीयर बार, शराब की दुकानें और गुटखा–तम्बाकू बनाने वाली कंपनियाँ खुलेआम क्यों संचालित हो रही हैं?
यह स्थिति एक गहरे नीतिगत विरोधाभास को उजागर करती है। एक ओर कानून नशे को बुरा बताते हैं, दूसरी ओर वही व्यवस्था उसके उत्पादन, बिक्री और प्रचार को वैध बनाती है।
राजस्व की मजबूरी या नीति की विफलता?
सरकार को शराब और तम्बाकू से भारी मात्रा में राजस्व प्राप्त होता है। यह तर्क दिया जाता है कि इस धन से विकास कार्य किए जाते हैं। परंतु यह विचार करना आवश्यक है कि नशे से प्राप्त राजस्व की कीमत कौन चुका रहा है?
अस्पतालों में बढ़ती बीमारियाँ, सड़क दुर्घटनाएँ, घरेलू हिंसा, अपराध, बेरोज़गारी और टूटते परिवार—इन सबका सीधा संबंध नशे से है। अंततः इन समस्याओं के समाधान में होने वाला खर्च भी सरकार और समाज को ही उठाना पड़ता है। ऐसे में यह राजस्व लाभ नहीं, बल्कि एक महँगा समझौता प्रतीत होता है।
युवा पीढ़ी पर सबसे गहरा आघात
नशा युवाओं की सोचने-समझने की क्षमता, निर्णय शक्ति और आत्मविश्वास को कमजोर करता है। नशे की गिरफ्त में फँसा युवा न तो स्वयं का भविष्य संवार पाता है और न ही राष्ट्र निर्माण में सहभागी बन पाता है। यह स्थिति किसी एक व्यक्ति या परिवार की नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य की चिंता है।
केवल कानून नहीं, ईमानदार इच्छाशक्ति आवश्यक
नशे के विरुद्ध लड़ाई केवल कानून बनाकर नहीं जीती जा सकती। इसके लिए आवश्यक है—
नशीले पदार्थों के उत्पादन और बिक्री पर कड़ा और पारदर्शी नियंत्रण
नशे के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रचार पर पूर्ण प्रतिबंध
युवाओं के लिए शिक्षा, खेल, रोजगार और रचनात्मक अवसरों का विस्तार
नशा मुक्ति अभियानों को कागज़ से निकालकर ज़मीन पर उतारना
निष्कर्ष
किसी भी राष्ट्र की असली संपत्ति उसका धन नहीं, बल्कि उसके स्वस्थ, जागरूक और सशक्त नागरिक होते हैं। यदि नशे से मिलने वाला राजस्व देश की युवा पीढ़ी को ही कमजोर बना दे, तो ऐसी नीति पर पुनर्विचार अनिवार्य हो जाता है।
आज आवश्यकता है कि नशे के खिलाफ लड़ाई को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकल्प बनाया जाए। तभी सही अर्थों में देशहित और जनहित की रक्षा संभव होगी।

Taza Khabar