*नई दिल्ली05मई25कर्म करने में सावधान…*
जो कर्म अभानावस्था (बेहोशी) में होते हैं, उन कर्मों का संचय नहीं होता। बाल्यावस्था अथवा मूढ़ावस्था में किये गये कर्मों का भी संचय नहीं होता। अहंकार रहित अवस्था में जो कर्म होते हैं उनका भी संचय नहीं होता तथा ज्ञानवानों के कर्मों का भी संचय नहीं होता। ऐसे ही फल की इच्छा के बिना किये गये निष्काम कर्मों का भी संचय नहीं होता।
कोई छोटा बच्चा नाचते-कूदते खेल रहा हो और नासमझी में किसी बच्चे का गला दबा दे तो उसके ऊपर दफा 302 का केस नहीं चलेगा। ज्यादा-से-ज्यादा उसे दो-चार चाँटे लगा देंगे। किसी ने शराब पी हो, बेहोश-अवस्था में हो गालियाँ बकने लग जाय तो उसके ऊपर मानहानि का केस लगाना उचित नहीं होगा क्योंकि उसे कर्म करने का भान ही नहीं है, नशे में कर्तापन का भाव ही नहीं है। ज्ञानी महापुरुष भी अकर्ता भाव से कर्म करते हैं इसलिए उन्हें कर्मबंधन नहीं लगता।
इसी प्रकार तुम जहाँ भी रहो, जो करो वह अकर्ता होकर करो तो तुम्हें भी कर्मबंधन नहीं लगेगा। कर्ताभाव होता है तो चलते-फिरते कीड़े-मकोड़े मर जायें तो भी कर्म का संचय होता है। किसी को पानी पिलाओ तब भी और किसी का कुछ ले लो तब भी कर्म का संचय होता है। किंतु अकर्ता भाव से करने पर वे ही कर्म बंधनकारक नहीं होते।
एक बार बुद्ध और उनके शिष्य घूमते-घामते कहीं जा रहे थे। मार्ग में उन्होंने देखा कि एक साँप को बहुत-सी चींटियाँ चिपककर काट रही थीं और साँप छटपटा रहा था।
शिष्यों ने पूछाः “भंते ! इतनी सारी चींटियाँ इस एक साँप को चिपकर काट रही हैं और इतना बड़ा साँप इन चीटियों से परेशान होकर छटपटा रहा है, ऐसा क्यों? क्या यह अपने किन्हीं कर्मों का फल भोग रहा है?”
बुद्धः “हाँ, कुछ साल पहले जब हम इस तालाब के पास से गुजर रहे थे, तब एक मछुआ मछलियाँ पकड़ रहा था। हमने उसे कहा भी था कि पापकर्म मत कर। केवल पेट भरने के लिए जीवों की हिंसा मत कर लेकिन उसने हमारी बात नहीं मानी। वही अभागा मछुआ साँप की योनि में जन्मा है और उसके द्वारा मारी हुई मछलियाँ ही चींटिया ही बनी हैं और वे अपना बदला ले रही हैं। मछुआ निर्दोष जीवों की हिंसा का फल भुगत रहा है।”
महाभारत के युद्ध के पश्चात एक बार अत्यंत व्यथित हृदय से धृतराष्ट्र ने वेदव्यास जी पूछाः
“भगवान ! यह कैसी विडंबना है कि मेरे सौ पुत्र मर गये और मैं अंधा बूढ़ा बाप जिंदा रह गया ! मैंने इस जन्म में इतने पाप तो नहीं किये हैं और पूर्व के कुछ पुण्य होंगे तभी तो मैं राजा बना हूँ। फिर किस कारण से यह घोर दुःख भोगना पड़ रहा है?”
वेदव्यासजी आसन लगाकर बैठे और समाधि में लीन हुए। उन्होंने धृतराष्ट्र के पूर्वजन्मों को जाना तब उन्हें पता चला कि पहले वह हिरन था, फिर हाथी हुआ, फिर राजा बना।
समाधि से उठकर उन्होंने धृतराष्ट्र से कहाः “पूर्वजन्म में तू राजा था और शिकार करने के लिए जंगल में गया था। वहाँ हिरन को देखकर उसके पीछे दौड़ा लेकिन तू हिरन का शिकार नहीं कर पाया। वह जंगल में अदृश्य हो गया। तेरे अहं को ठेस पहुँची। गुस्सें में आकर तूने वहाँ आग लगा दी, जिससे थोड़ा हरा-सूखा घास और सूखे पत्ते जल गये। वहीं पास में साँप का बिल था। उसमें साँप के बच्चे थे जो अग्नि में जलकर मर गये और सर्पिणी अंधी हो गयी। तेरे उस कर्म का बदला इस जन्म में मिला है। इससे तू अंधा बना है और तेरे सौ बेटे मर गये हैं।”
जय जय श्री राधे…
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