जोधपुर २९नवम्बर २०२५ * किसान की बर्बादी का असली हिसाब; सरकार के झूठे MSP और खेतों की कराहती सच्चाई
मध्यप्रदेश और देश का किसान क्या चाहता है? सिर्फ इतना कि मेहनत का दाम मिले। लेकिन सरकार की नीतियों और बाजार के खेल ने किसान की लूट को नया रिकॉर्ड दे दिया है।
एक एकड़ मक्का—मेहनत किसान की, मुनाफा दलालों का
किसान एक एकड़ मक्का बोने के लिए क्या खर्च करता है? जमीन से अनाज उगलवाने तक उसके हाथों से कितना पसीना गिरता है?
यह “किताब का हिसाब” नहीं, किसान की पूरी जिंदगी का हिसाब है।
किसानी का कड़वा सत्य : ₹27,700 खर्च, और बदले में मिलता क्या?
•बीज: ₹4,000
•गहरी जुताई: ₹2,700
•बखरनी: ₹900
•बोनी: ₹1,400
•DAP खाद: ₹1,400 (ब्लैक में तो ₹2,000 तक)
•यूरिया: ₹900 (ब्लैक में ₹1,500)
•कीटनाशक: ₹2,000
•दवाई डालना (दो बार): ₹2,400
•कटाई मजदूरी: ₹2,800
•थ्रेसर: ₹1,500
•मजदूर: ₹3,200
•नरवाई प्रबंधन: ₹1,600
•रोटावेटर: ₹1,400
•ट्राली भाड़ा: ₹1,500
कुल लागत: ₹27,700 प्रति एकड़
यही वो सच है जो किसी भी कृषि मंत्रालय की फाइल में नहीं मिलता।
किसान का सपना : 20 क्विंटल पैदावार, MSP ₹2400 तो मिलेगा ₹48,000
अगर उत्पादन अच्छा हो, मौसम ठीक रहे, दवा सही पड़े, खाद उपलब्ध हो, और कहीं कोई सरकारी “गड़बड़” न हो…तो किसान को उम्मीद रहती है कि 20 क्विंटल निकलेगा, MSP ₹2400 मिलेगी, और कम से कम ₹48,000 हाथ में आएंगे।
लेकिन असलियत? सरकार की नीतियों ने ये सपना भी छीन लिया।
साल 2024–25 की भयावह सच्चाई; उत्पादन औंधे मुंह गिरा
इस साल किसानों को जो मिला—
•कई जगह 5 क्विंटल प्रति एकड़,
•अच्छा खेत 10 क्विंटल,
•और सर्वोत्तम हालत में भी 12 क्विंटल।
यानी किसान की मेहनत का आधा नहीं, चौथाई भी नहीं निकल पाया।
और बाजार में भाव?
₹1300 प्रति क्विंटल, MSP से भी ₹1100 कम।
अब किसान की आय का कातिलाना हिसाब देखिए :
12 क्विंटल (सबसे अच्छा परिणाम) × ₹1300 = ₹15,600
और खर्च? ₹27,700
किसान की जेब में कितना?
–₹12,100 (साफ घाटा)
और 5 क्विंटल निकले तो?
₹6,500 की आमदनी – ₹27,700 खर्च = –₹21,200 का नुकसान
यानी किसान मक्का नहीं उगा रहा, हर एकड़ में अपना जीवन गिरवी रख रहा है।
सरकार चुप क्यों है?
क्यों MSP मज़ाक बन गया है?
क्यों हर साल किसान कर्ज में डूब रहा है?
क्योंकि-
1. खाद की किल्लत और ब्लैक मार्केटिंग सरकार की खुली नाकामी है
▶️ DAP, यूरिया किसानों को नहीं, दलालों को मिलती है।
▶️ किसान लाइनों में लगता है, दलाल गोदामों में सोना कूटते हैं।
2. MSP सिर्फ कागज पर, खरीद शून्य
▶️ सरकार MSP की घोषणा करती है, लेकिन खरीद केंद्र नहीं खोलती। नतीजा – किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर।
3. मौसम और फसल सुरक्षा की कोई नीति नहीं
बीमा कंपनियां प्रीमियम खाती हैं, किसान को भुगतान नहीं देतीं।
4. बढ़ती लागत पर सरकार मौन और बाजार सक्रिय
किसान की लागत लगातार बढ़ रही है,
पर MSP उसी गति से नहीं बढ़ती।
यह किसान विरोधी नीति का सबसे काला चेहरा है।
किसान कह रहा है—हम फसल उगाते हैं, सरकार नुकसान उगाती है
आज हालात यह हैं कि👇
किसान मक्का बोकर, घाटा काटकर, कर्ज लेकर, निराशा में डूबकर खेती कर रहा है।
और सरकार टीवी पर कहती है-
“किसानी लाभ का धंधा है।”
अगर यह लाभ है, तो नुकसान किसे कहते हैं?
**सरकार को जवाब देना होगा—
किसान को नुकसान में क्यों ढकेला?
MSP पर खरीद क्यों नहीं की? खाद की ब्लैक मार्केटिंग क्यों रोक नहीं पाए?
देश किसान पर चलता है, किसान घाटे पर नहीं।
जब एक एकड़ में किसान को ₹20,000 तक का नुकसान होता हो, तो सरकार का विकास मॉडल नहीं, किसान की कब्र खोदने का मॉडल चल रहा है।

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