रिपोर्ट अनुपमा सेंगर।
औरैया24सितम्बर*बैंक में हम थे,हवा न थी-अनुपमा सेंगर
बैंक मे हम थे, हवा न थी,
हम सांसों की बची बासी हवा मे सांसें लेकर अर्थव्यवस्था में जिंदा थे।
जिंदा थे इस ख्याल से भी कि हम बैंक मे है,
ओर इससे भी की देंखो तो कितने होंगे जो बैक मे नही होते ,
हम विकासशील की हतशीला भूमि के बैंक मे थे।
बैंक मे हवा न थी,पैसे थे,
जैसे जंगल में हवा दिखती नही,
पर जिंदा रखती है,
लेकिन हवा अपने जीवितों को गुस्सा नही देती ,
पैसे अपने जीवितों को गुस्सा देते है,
बैंक मे हवा न थी ,गुस्सा था,
जिनकी पास बुक मे पैसे ज्यादा थे,
उनका गुस्सा था,
जिनकी पासबुक मे कम थे,
उनके ऊपर गुस्सा था,
उनके ऊपर बैंक के कम्प्यूटर का भी गुस्सा था,
वो डॉ कि आवाज मे चिड़चिड़ा कर हँसते थे,
बैंक मे हवा न थी,कम्प्यूटर थे,
ओर हर कम्प्यूटर के साथ,
कबॉर्न कॉपी की तरह नत्थी एक क्लर्क था,
जिनकी पासबुक भारी थी,
उन्हें देख वह भी रिरियाता था,
जिनकी हल्की थी, उन्हें गरियाता था।
बैंक मैं हवा न थी,समाज था
समाज अपनी आदतों में कतई सहनशील न था,
वह हिकारत से देखता था,
और देख लिये जाने पर पुंछ दबाकर कुकआता था,
वह घर से योजना बनाकर अगर चलता था,
तो ही विन्रम हो पाता था,
अन्यथा इंसानियत के कैसे भी कुदर्शय पर
सुतून सा खड़ा रह जाता था।
बैंक में हम थे बैंक मे हवा न थी।
हुकुम सिंह बैंक मैनजर रुरूगंज।

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