July 5, 2022

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टोंक 06 जून*तीनों कृषि कानूनों की प्रतियां जलाकर किसानों ने मनाया संपूर्ण क्रांति दिवस*

टोंक 06 जून*तीनों कृषि कानूनों की प्रतियां जलाकर किसानों ने मनाया संपूर्ण क्रांति दिवस*

टोंक 5 जून /किसान विरोधी तीन कृषि कानूनों को अध्यादेश से लागू किए आज एक वर्ष पूरा होने एवं संपूर्ण क्रांति दिवस के अवसर पर राष्ट्रव्यापी आह्वान के तहत संयुक्त किसान मोर्चा की अगुवाई में शनिवार प्रातः दस बजे टोंक सवाई माधोपुर सांसद कार्यालय डीआरडीए टोंक के सामने किसान प्रतिनिधियों द्वारा तीनों कृषि कानूनों की प्रतियां जलाकर विरोध प्रदर्शन कर संपूर्ण क्रांति दिवस मनाया गया l

*संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि एडवोकेट महावीर तोगड़ा* ने बताया कि 5 जून 2020 को जनविरोधी केंद्र सरकार ने किसान विरोधी 3 काले कानूनों को बनाकर किसानों के हितों पर कुठाराघात करने का प्रयास किया, किसानों ने केंद्र द्वारा बनाए गए इन कृषि कानूनों का विरोध पूरे देश में जन आंदोलन के रूप में शुरू किया हुआ है जिसको आज ही के दिन 5 जून 2021 को पूरा 1 वर्ष हो गया है, इस अवसर पर किसान आंदोलन के नेतृत्वकर्ता संयुक्त किसान मोर्चा ने राष्ट्रव्यापी आह्वान किया इसके तहत टोंक में भी किसानों के समर्थन में काले कानूनों की प्रतियां क्षेत्रीय सांसद के कार्यालय के सामने जलाकर अपना विरोध अहिंसात्मक तरीके से व्यक्त किया गया l
*विरोध प्रदर्शन में एडवोकेट महावीर तोगड़ा, किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष श्रीराम चौधरी, मुजीब आजाद, मदन चौधरी पूर्व सरपंच, कांग्रेस के देहात ब्लॉक अध्यक्ष रामसिंह मुकुल, जिला परिषद सदस्य हंसराज गुंजल, पूर्व सरपंच गोविंद चौधरी,शिवजीराम, पोलूराम, दामोदर चावला, गोगाराम जाट,मुकेश यादव, सूरजमल फौजी, पार्षद मूलचंद सैनी, कमल चौधरी, पार्षद दयाराम, राजेश मीणा, शाकिब खान, जितेंद्र गुर्जर इत्यादि मुख्य रूप से शामिल रहे, प्रदर्शनकारियों ने काले कानूनों की प्रतियां जलाते हुए तीनों काले कानूनों को वापस लेने,स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद की गारंटी का कानून बनाने की मांग करते हुए सांसद कार्यालय के सामने जमकर नारेबाजी की l*
*महावीर तोगड़ा* ने कानूनों की जानकारी देते हुए बताया कि कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक 2020 इसे अनुबंध के आधार पर खेती का कानून के नाम से भी पुकारा जाता है,इस कानून के माध्यम से सरकार निजी कंपनियों व किसानों के बीच समझौता वाली खेती का रास्ता खोलकर किसानों को अपनी ही जमीन पर बंधुआ मजदूर बनाने का रास्ता तय कर चुकी हैं। किसानों व निजी कंपनियों या ठेकेदार के बीच कोई विवाद होने पर इसकी धारा 19 के अनुसार किसानों को अपने अधिकार के लिए सिविल न्यायालय में जाने का हक़ नहीं होगा,इस देश में 27 करोड़ परिवार खेती किसानी से जुड़े हुए हैं, इनमें से 15 करोड़ परिवार भूमिहीन होकर बंटाई या आधोली पर खेती कर जीवनयापन कर रहे हैं।इस कानून के बाद बड़ी कंपनियां या पूंजीपतियों द्वारा किसानों की जमीन अनुबंध पर लेकर मशीनों से खेती करने से ये परिवार पूरी तरह से बेरोजगार हो जाएंगे।

इस कानून में अनुबंध करने वाले को किसानों की फसल एमएसपी से कम कीमत पर नहीं खरीद सकने की बाध्यता नहीं है। अनुबंध के बाद भी फ़सल नहीं खरीदने या भुगतान नहीं करने पर एसडीओ के यहां आवेदन देने मात्र का अधिकार होगा,किसान अपनी मर्जी की फसल नहीं बो सकता, खाद ,बीज दवाईयां , मशीनरी सब अनुबंध करने वाले की मर्जी की होगी।

*किसान यूनियन के जिला अध्यक्ष श्री राम चौधरी* ने आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक 2020के संबंध में बताया कि यह कानून पूरी तरह से जमाखोरी वह कालाबजारी को अमलीजामा पहनाने वाला है।अब सरकार को कोई जानकारी नहीं होगी कि किसके पास कितना स्टोक है । अब सरकार केवल भूखमरी, युद्ध या बहुत ही विषय परिस्थितियों में ही उन्हें रेगूलेट कर सकती हैं।
देश के 90%किसानो के पास अपनी उपज को भण्डारण की व्यवस्था नहीं है, इसलिए अब बड़े औद्योगिक घरानों वाले किसानों की फसल को सस्ते में खरीद कर भारी मुनाफा कमाकर आम आदमी को बेचेंगे। जिससे मंहगाई चरम पर पहुंचेगी।

कृषि उत्पादन, व्यापार और वाणिज्य( संवर्धन और सुविधा) विधेयक कानून के बारे में *किसान कांग्रेस के पूर्व जिला अध्यक्ष मुजीब आजाद* ने बताया कि इस कानून की खामी यह है कि इससे एपीएमसी मंडी की प्रासंगिकता समाप्त हो जावेगी, क्योंकि एपीएमसी मंडी के बाहर निजी कारोबारी बेलगाम व्यवसाय करने को स्वतंत्र होंगे ,जिन पर कोई निगरानी या नियंत्रण करने वाला नहींहोगा, जिससे बाजार में उपलब्ध उत्पाद की जानकारी सरकार या किसी अन्य संस्था को नहीं हो सकेगी और एपीएमसी के बाहर तो व्यापार कर मुक्त रहेगा, वही मंडियों में कई तरीके के शुल्क और उपकर लगेंगे, जिससे एपीएमसी मंडी बंद हो जाएगी। इस कानून में वर्तमान एपीएमसी मंडियों केआढ़तियों से किसानों को मुक्त करने का कोई उपाय नहीं किया गया है ,अपितु मंडियों को ही बंद कर समाप्त करने की अवधारणा निहित प्रतीत होती हैं। किसानों की पहुंच मंडियों तक ज्यादा से ज्यादा हो इस हेतु नवीन मंडियों के निमार्ण की कोई व्यवस्था नहीं की गई है।कृषि सुधार के नाम से किसानों को पूंजिपतियों के निजी बाजार के हवाले करने का यह षड़यंत्र है उन्होंने कहा कि सरकार स्वयं जब बड़े औद्योगिक घरानों व पूंजीपतियों को समानांतर मजबूत बाजार खड़ा करने का अवसर देगी तो एपीएमसी मंडियां उनके आगे टिक नहीं पाएगी। और ज्योंही सरकारी मंडियां बन्द होगी, उसी दिन किसानों की उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने की व्यवस्था बंद हो जायेगी,केंद्र सरकार किसानों की फसलों को एमएसपी पर खरीदने की अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होकर किसानों को उनकी उपज को निजी पूंजीपतियों को औने-पौने दामों पर बेचने को विवश करने जा रही है। और एमएसपी पर खरीद बंद होते सार्वजनिक वितरण प्रणाली( पीडीएस सिस्टम )से आम जन को मिल रही खाद्यान्न वितरण व्यवस्था बंद हो जाएगी,इस कानून के माध्यम से सरकार निजी क्षेत्र को बिना किसी जवाबदेही के कृषि उपज की खरीद फरोख्त की छूट देकर स्वयं एमएसपी पर खाद्यान्न खरीदने से बचने का रास्ता तलाश रही है। सरकार चाहती है कि किसानों की उपज को निजी क्षेत्र के पूंजीपति ही खरीदें, ताकि सरकार भंडारण व वितरण की जवाबदेही से बच सकें। इसके दुष्परिणाम जब देखने को मिलेंगे, जबकि किसी महामारी या खाद्यान्न संकट के समय सरकार को महंगे दामों पर निजी क्षेत्र से खाद्यान्न खरीद कर लोगों को उपलब्ध कराना पड़ेगा।

प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार से इन तीनों कृषि कानूनों को तुरंत वापस लेने एवं स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार किसानों की सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर
सभी फसलों को एमएसपी पर खरीदने की गारंटी का कानून बनाकर तुरंत लागू करने की मांग की l