July 5, 2022

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कौशाम्बी 30 मई*पत्रकारों को चुनौतियों से निपटते हुए पत्रकारिता के दामन को बचाए रखना होगा यही सच्ची पत्रकारिता होगी*

कौशाम्बी 30 मई*पत्रकारों को चुनौतियों से निपटते हुए पत्रकारिता के दामन को बचाए रखना होगा यही सच्ची पत्रकारिता होगी*

*30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस पर एकत्रित हुए पत्रकारों ने पत्रकारिता की चुनौतियों से निपटने के लिए व्यक्त किए विचार*

*कौशाम्बी* हिंदी पत्रकारिता के लिए 30 मई को बहुत अहम दिन माना जाता है क्योंकि आज ही के दिन हिंदी भाषा में पहला समाचार पत्र “उदन्त मार्तण्ड” का प्रकाशन हुआ था।पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने 30 मई, 1826 को इसे कलकत्ता से एक साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर शुरू किया था। इसके प्रकाशक और संपादक वो खुद थे।इसी वजह से पंडित जुगल किशोर शुक्ल का हिंदी पत्रकारिता के जगत में विशेष स्थान है। उक्त बातें हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर एकत्रित पत्रकारों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार रामबदन भार्गव ने कही है

पत्रकारिता दिवस के अवसर पर उपस्थित पत्रकारों ने कहा कि लोकतंत्र के एक मजबूत स्तम्भ की साख आज दांव पर है वक्ताओं ने कहा कि. जी हां मैं बात कर रहा हूं पत्रकारिता की, जो एक महत्वपूर्ण कड़ी है सरकार और जनता के बीच.  समाज में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि यह जनता और सरकार के बीच सामंजस्य बनाने में मदद करता है. लेकिन ये अब ऐसे स्तर पे आ गया है जहां लोगों का भरोसा ही इस पर से खत्म होता जा रहा. इसका अत्यधिक व्यावसायीकरण ही शायद इसकी इस हालत की वजह है. पर जहां तक मैं सोचता हूं इसके लिए अनेक कारक हैं जो इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं.  सोशल साइट्स, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इंटरनेट के जमाने में प्रिंट मीडिया कमजोर हो चला. क्योंकि व्हाट्सएप्प, ट्विटर और फेसबुक पर हर समाचार बहुत ही तेज़ी से फ़ैल जाता  है और मिर्च मसाला लगाने में भी आसानी हो जाती है लोगों को.वायरल का फैशन चल पड़ा है तो कौन सुबह तक इंतज़ार करेगा? सभी समाचार पत्रों के ऑनलाइन एडिशन भी आ गए हैं पर उतने लोकप्रिय नहीं हैं, सभी अब फेसबुक का सहारा लेते हैं. क्या डिजिटल युग का आना ही इसकी लोकप्रियता कम होने का एकमात्र कारण है? न्यूज चैनलों की बाढ़ सी आ गयी है पर आज सच्ची और खोजी पत्रकारिता में गिरावट आ गयी, सभी मीडिया हॉउस राजनितिक घरानों से जुड़े हुए हैं, टीआरपी बढ़ाने की होड़ लगी है, ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा आम है, देश की चिंता कम विज्ञापनों की ज्यादा है. ये कारण भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है

राजनीति और पूंजीवाद से मीडिया की आजादी पर भी खतरा मंडरा रहा है पिछले कुछ वर्षों में मीडिया से जुड़े कई लोगों पर कितने ही आरोप लगे, कुछ जेल भी गए तो कुछ का अब भी ट्रायल चल रहा है  आज पत्रकारिता और पत्रकार की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठता है? आखिर हो भी क्यों नहीं? वो जिसे चाहे चोर बना दे, जिसे चाहे हिटलर. कोर्ट का फैसला आता भी नहीं पर मीडिया पहले ही अपना फैसला सुना देता है. किसी का महिमामंडन करने से थकता नहीं तो किसी को गिराने से पीछे हटता नहीं. आज मीडिया का कोई भी माध्यम सच दिखाने से ही डरने लगा है.  कहीं आज मीडिया सरकार से तो नहीं डर रहा? खोजी पत्रकारिता का असर कुछ भयानक होने लगा है. आये दिन पत्रकारों पर हमले होने लगे हैं. किसी भी क्षेत्र की त्रुटि और भ्रष्टाचार को सामने लाने से पत्रकारो को जान से हाथ धोने पड़ रहे. पत्रकार अपनी ईमानदारी से समझौता करने को विवश हो रहे. अगर ये सच है तब तो वो दिन दूर नहीं जब हम सच और निष्पक्ष खबरों के लिए तरस जायेंगे.

वक्ताओं ने कहा कि मीडिया को लोकतंत्र का एक स्तम्भ माना गया  है और इसकी अपनी महत्ता है क्योंकि यह हमारे चारों ओर मौजूद होता है, अतः यह निश्चित सी बात है की इसका असर समाज के ऊपर भी पड़ेगा. किसी ने भले ही कितने परोपकारी कार्य किये हों और अगर मीडिया चाह ले तो उसकी छवि एक पल में धूमिल कर सकता है.आज यही वास्तविकता है. फलस्वरूप मीडिया को चलाने के लिए खर्चे भी बढ़े हैं.  इन खर्चों को पूरा करने के लिए ज्यादातर मीडिया हाउस सरकार, पूंजीपति और बड़ी बड़ी कंपनियों पर आश्रित हो गए हैं. इन सब पर निर्भर होने से मीडिया की आजादी ही खतरे में आ गई है. नेता, दलालों से गठबंधन, ब्रेकिंग न्यूज़, विज्ञापन और अनेक हथकण्डे अपना मीडिया आज आर्थिक रूप से सक्षम है पर क्या वो अपनी पहचान और वो वजूद कायम रखने में सक्षम है? इसका जवाब आएगा ” नहीं”.

सभी लोग, हम, आप और मीडिया बदलाव की बात तो करते हैं पर इनमें कोई भी बदलना नहीं चाहता. सभी एक ही नाव पर सवार हैं पर स्थिति तो डंवाडोल और नाजुक है. जो आम जनता की आवाज़ है वही कराह रहा तो कौन खड़ा होगा समाज को आइना दिखाने के लिए? सरकार और सरकार के कार्यों पर कौन नज़र रखेगा? हमारी और आपकी परेशानियों को सरकार तक कौन पहुंचायेगा? विद्यार्थियों, कामगारों और आम जनता की आवाज कौन बनेगा? वक्ताओं ने कहा कि अब भी वक़्त है कि हम संभल जायें, चकाचौंध, टीआरपी की दौड़ और पैसों के पीछे न भाग हम निष्पक्ष पत्रकारिता पर ध्यान दें तो शायद लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ खोखला होने से बच जाये

वक्ताओं ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के लिए 30 मई को बहुत अहम दिन माना जाता है क्योंकि आज ही के दिन हिंदी भाषा में पहला समाचार पत्र “उदन्त मार्तण्ड” का प्रकाशन हुआ था।पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने 30 मई, 1826 को इसे कलकत्ता से एक साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर शुरू किया था। इसके प्रकाशक और संपादक वो खुद थे।इसी वजह से पंडित जुगल किशोर शुक्ल का हिंदी पत्रकारिता के जगत में विशेष स्थान है।

वक्ताओं ने कहा कि 1826 से पहले अंग्रेजी, फारसी और बांग्ला में तो अनेक समाचार पत्रों का प्रकाशन हो रहा था, लेकिन हिंदी में एक भी समाचार पत्र नहीं निकलता था।इसी बात को मद्देनजर रखते हुए जुगल किशोर ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन शुरू किया था। यह पत्र हर मंगलवार को निकलता था।लेकिन ‘उदन्त मार्तण्ड’ की शुरूआत में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि हिन्दी पत्रकारिता आगे चल कर इतना बड़ा आकर ले लेगी और इतनी महत्वपूर्ण हो जाएगी।

‘पंडित जुगल किशोर शुक्ल मूल रूप से कानपुर के रहने वाले थे जो एक वकील होने के बावजूद पत्रकारिता को ज्यादा अहमियत देना चाहते थे।लेकिन उस समय औपनिवेशिक ब्रिटिश ने कलकत्ता को अपनी कर्मस्थली बनाया हुआ था जिस वजह से भारत में हिंदुस्तानियों के हक की बात करना बहुत बड़ी चुनौती बन चुका था।इसलिए जुगल किशोर शुक्ल के ‘उदन्त मार्तण्ड’ को एक तरह का साहसिक प्रयोग कहा जा सकता है।

इस साप्ताहिक समाचार पत्र के पहले अंक की 500 कॉपियां छपी लेकिन हिंदी भाषी पाठकों की कमी की वजह से उसे ज्यादा पाठक नहीं मिल सके।इसके अलावा हिंदी भाषी राज्यों से दूर होने के कारण उन्हें समाचार पत्र डाक द्वारा भेजना पड़ता था जो आर्थिक रूप से महंगा सौदा हो गया था।हालांकि इसके लिए जुगल किशोर ने सरकार से बहुत अनुरोध किया कि वे डाक दरों में कुछ रियायत दें लेकिन ब्रिटिश सरकार इसके लिए राजी नहीं हुई। उस समय की चुनौतियां आज भी हिंदी पत्रकारिता के लिए कायम है और समाज में हिंदी पत्रकारिता में काम करने वाले लोगों को तमाम परेशानियां झेलनी पड़ रही है हम पत्रकारों को इन चुनौतियों से निपटते हुए पत्रकारिता के दामन को बचाए रखना होगा यही सच्ची पत्रकारिता होगी इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार रामबदन भार्गव वरिष्ठ पत्रकार सुशील केसरवानी अनुराग शुक्ला सुबोध केसरवानी अशोक विश्वकर्मा सुनील पांडेय बालमुकुंद तिवारी जमशेदपुर मुअज्जम खान रमेश त्रिपाठी सच ज्ञान चंद्र द्विवेदी सौमित्र बाजपेई सहित तमाम पत्रकार मौजूद रहे