July 5, 2022

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औरैया 24 मई *मुनीश त्रिपाठी को मिला प्रतिष्ठित केएम मुंशी पुरस्कार*

औरैया 24 मई *मुनीश त्रिपाठी को मिला प्रतिष्ठित केएम मुंशी पुरस्कार*

*उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने वर्ष 2019 के लिए बीते फरवरी माह में की थी पुरस्कार की घोषणा*

*मुनीष त्रिपाठी की प्रथम पुस्तक विभाजन की त्रासदी के लिए मिला पुरस्कार*

*औरैया।* दिबियापुर निवासी लेखक, पत्रकार व विचारक मुनीष त्रिपाठी को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से उनके द्वारा लिखित विभाजन की त्रासदी पुस्तक के लिए केएम मुंशी पुरस्कार दिया गया है । वर्ष 2019 के सम्मान पुरस्कार के लिए चयनित किए गए नामों की संस्थान के निदेशक श्रीकांत मिश्र ने घोषणा बीते 26 फरवरी को की थी। लेखक मुनीष त्रिपाठी के द्वारा लिखित पहली पुस्तक में ही पुरस्कार मिलना जनपद के लिये गौरव की बात है।
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के वर्ष 2019 के सम्मानों पुरस्कारों पर निर्णय लेने के लिए गठित पुरस्कार समिति की बैठक फरवरी में कार्यकारी अध्यक्ष सदानंद प्रसाद गुप्त की अध्यक्षता में हुई थी। बैठक में राजनीति शास्त्र विधा के अंतर्गत मुनीष त्रिपाठी द्वारा वर्ष 2019 में भारत-पाकिस्तान विभाजन पर लिखी गई पुस्तक विभाजन की त्रासदी के लिये केएम मुंशी पुरस्कार के लिए चयनित किया गया था। पुरस्कार के अंतर्गत धनराशि, प्रशस्ति पत्र , अंगवस्त्र दिया गया है । इस पुस्तक का विमोचन हरिद्वार पंतजलि पीठ में वर्ष 2019 में योग गुरु रामदेव,हरिहरानंद जी महाराज आरएसएस के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी सहित तमाम हस्तियों ने किया था। पुस्तक प्रभात प्रकाशन ग्रुप ने प्रकाशित की थी। मुनीष त्रिपाठी के साथ पुरस्कार के लिए चयनित अन्य साहित्यकारों के नामों का भी एलान उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक श्रीकांत मिश्र ने किया था। उनकी इस उपलब्धि पर यूपी सरकार के मंत्री लाखन सिंह राजपूत , सीडीओ अशोक मिश्रा , राम कुमार अवस्थी , प्रेस क्लब के अध्यक्ष सुनील गुप्ता,सरंक्षक सुरेश मिश्र, पूर्व प्राचार्य डीपी सिंह, समाजसेवी राघव मिश्र, अवधेश शुक्ला, विशाल दुबे, रामकिशोर वर्मा, पुष्कर मिश्र, नरेश भदौरिया , रविन्द्र यादव, रवि शर्मा आदि ने खुशी जताते हुए बधाई दी है। विभाजन की त्रासदी पुस्तक लेखक मुनीष त्रिपाठी ने गहन और लंबे कालखण्ड में शोध के बाद अकाट्य प्रमाणों पर आधारित भारत के दुखद विभाजन विषय पर लिखी है । पुस्तक में बताया गया है कि विभाजन के क्या कारण थे, क्या विभाजन को रोका जा सकता था, टाला जा सकता था ? विभाजन की मांग का क्या स्थायी समाधान था ? क्या तत्कालीन भारत के राजनेताओं से चुकें या गलतियां हुई उस पर भी लेखक मुनीष त्रिपाठी ने अकाटय प्रमाणों से स्थिति का विश्लेषण किया है। लेखक ने बताया कि पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम लखनऊ में प्रति वर्ष की भांति होना संभावित था परंतु कोरोना महामारी के कारण कार्यक्रम निरस्त हुआ है जिसके कारण पुरस्कार संबन्धी सामग्री रजिस्टर्ड डाक द्वारा घर भेजी गई है।